Betal Nut Farming Is Making Rich To Many Farmers In Gorakhpur – देसी पान की खेती से कइयों की संवारी तकदीर, सहफसली से ले रहे दोगुना मुनाफा


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गेहूं, धान और मक्का जैसे परंपरागत फसलों से हटकर देसी पान की खेती शुरू करने पर आसपास के लोगों ने दशरथ की समझदारी पर जमकर तंज कसे। पर यह दशरथ का जज्बा ही था कि उन्होंने मुंबई में लगी नौकरी छोड़ दी और किसी की परवाह किए बगैर तजुर्बा और तदबीर से खुद की तकदीर बदल डाली। 

खजनी इलाके के भिटहा गांव निवासी दशरथ ने महज 15 डिस्मिल खेत में पान की खेती के साथ परवल, कुंदरू जैसे सह फसली से करीब एक से सवा लाख रुपये का मुनाफा कमाया। दशरथ बताते हैं कि करीब 20 वर्ष पहले जब उन्होंने पान की खेती शुरू की, तो सबसे ज्यादा परेशानी तापमान को लेकर हुई।

पान के लिए 20 से 30 डिग्री सेल्सियस के बीच तापमान की जरूरत होती है। खेती सफल न होने के बाद कुछ दिनों तक उन्होंने मुंबई में प्राइवेट नौकरी की। लेकिन उनका मन नहीं माना और वापस आने के बाद महोबा में पान की खेती के तरीके देखने गए।

वहां से लौटकर उन्होंने फिर पान की खेती शुरू की। पान की खेती के लिए फरवरी सबसे बेहतर महीना है। पुराने पौधे को ही कलम कर लगा दिया जाता है। जुलाई से अक्तूबर में इसका विकास तेजी से होता है। नवंबर से पान का पत्ता तोड़ने लायक हो जाता है।

दशरथ ने तापमान नियंत्रित करने के लिए देसी तकनीक अपनाई। खेत के चारों तरफ  सरपत के कंडा से बाड़ बनाया और पुआल का छाजन लगा दिया और कंडे के सहारे लताओं को फैला दिया। गर्मी में रोजाना दो से तीन बार सिंचाई की।

बस फिर क्या था, खेती लायक अनुकूल माहौल तैयार हो गया। अब खेती का दायरा बढ़कर एक बीघा हो गया है। इसी खेती की बदौलत उन्होंने दो बेटे व दो बेटियों को पढ़ाया और उनकी शादी भी की। अब उनके गांव के राजेंद्र और पूर्णमासी ने भी पान की खेती शुरू कर दी है।

दशरथ ने बताया कि वे रासायनिक उर्वरक या कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं करते हैं। अरहर, उड़द, मटर की दाल, नीम की खली को बारीक तोड़कर सरसों के साथ पान क्यारियों में डालते हैं।

बचत का फंडा  
दशरथ के मुताबिक, वह सप्ताह में दो से तीन बार पान का पत्ता तोड़ते हैं। एक बार में करीब 200 ढोली पान तैयार होता है। एक ढोली में 50 पत्ते होते हैं और एक ढोली की कीमत उन्हें 20 से 25 रुपये मिलती है, जबकि लागत 15,000 रुपये पड़ती है। वहीं, सह फसली परवल, कुंदरू, तोरई आदि की बुवाई से प्रत्येक सीजन में आठ से 10,000 रुपये की कमाई हो जाती है। इस हिसाब से प्रत्येक महीने करीब 40 हजार रुपये की बचत होती है।

लाजवाब होता है स्वाद
पान के फुटकर विक्रेताओं का कहना है कि देसी पान का स्वाद लाजवाब होता है। मगही जैसा स्वाद होने के चलते ग्राहक इसे ज्यादा पसंद करते हैं। एक फुटकर पान विक्रेता रोजाना कम से कम दो डोली देसी पान बेच लेता है। 

गेहूं, धान और मक्का जैसे परंपरागत फसलों से हटकर देसी पान की खेती शुरू करने पर आसपास के लोगों ने दशरथ की समझदारी पर जमकर तंज कसे। पर यह दशरथ का जज्बा ही था कि उन्होंने मुंबई में लगी नौकरी छोड़ दी और किसी की परवाह किए बगैर तजुर्बा और तदबीर से खुद की तकदीर बदल डाली। 

खजनी इलाके के भिटहा गांव निवासी दशरथ ने महज 15 डिस्मिल खेत में पान की खेती के साथ परवल, कुंदरू जैसे सह फसली से करीब एक से सवा लाख रुपये का मुनाफा कमाया। दशरथ बताते हैं कि करीब 20 वर्ष पहले जब उन्होंने पान की खेती शुरू की, तो सबसे ज्यादा परेशानी तापमान को लेकर हुई।

पान के लिए 20 से 30 डिग्री सेल्सियस के बीच तापमान की जरूरत होती है। खेती सफल न होने के बाद कुछ दिनों तक उन्होंने मुंबई में प्राइवेट नौकरी की। लेकिन उनका मन नहीं माना और वापस आने के बाद महोबा में पान की खेती के तरीके देखने गए।

वहां से लौटकर उन्होंने फिर पान की खेती शुरू की। पान की खेती के लिए फरवरी सबसे बेहतर महीना है। पुराने पौधे को ही कलम कर लगा दिया जाता है। जुलाई से अक्तूबर में इसका विकास तेजी से होता है। नवंबर से पान का पत्ता तोड़ने लायक हो जाता है।


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देसी तकनीक से नियंत्रित किया तापमान 





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